क्या सिर्फ कहानियों में है शिवाजी के भरोसेमंद श्वान 'वाघ्या', जिसके स्मारक हटाने की मांग पर अड़े छत्रपति के वंशज

मुंबई: शिवाजी के वंशज और पूर्व राज्यसभा ने महाराष्ट्र के कीएम देवेंद्र फड़णवीस से रायगढ़ किले से एक श्वान के स्मारक को हटाने की मांग की है। कोल्हापुर शाही परिवार के वंशज का कहना है कि 1920 के दशक में बनाया गया था। छत्रपति के वाघ्या नाम के किसी पालतू कुत्ते के बारे में कोई दस्तावेजी सबूत मौजूद नहीं है। यह शिवाजी महाराज की विरासत को कम करने की साजिश है। किंवदंतियों के अनुसार, वाघ्या शिवाजी महाराज का विश्वासी श्वान था, जिसने छत्रपति के देहांत के बाद उनकी चिता में छलांग लगाकर आत्मदाह कर लिया था।

ऐतिहासिक प्रमाण नहीं होने का दावा

औरंगजेब की कब्र को लेकर शुरू हुए विवाद के बीच रायगढ़ में किले में मौजूद श्वान वाघ्या के स्मारक पर चर्चा शुरू हो गई है। शिवाजी के वंशज संभाजी राजे छत्रपति ने सीएम फड़णवीस को पत्र लिखकर 31 मई से पहले वाघ्या के स्मारक को किले से हटाने की मांग की है। इसी किले में छत्रपति की समाधि भी है। संभाजी राजे का कहना है कि रायगढ़ किले पर कुत्ते का स्मारक छत्रपति शिवाजी महाराज का अपमान है। एएसआई का भी मानना है कि इसका कोई ऐतिहासिक प्रमाण भी नहीं है, इसलिए इसे हटा देना चाहिए।

किंवदंतियों में काफी मशहूर है वाघ्या

शिवाजी महाराज के पास पालतू श्वान था या नहीं, इसके बारे में प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है, मगर किंवदंतियां कई हैं। कई मराठी नाटकों में भी वाघ्या का जिक्र आधुनिक कथाकारों ने किया है। वाघ्या का मतलब बाघ होता है। कहानियों के अनुसार, बाघ की ताकत रखने वाला वाघ्या शिवाजी महाराज का भरोसेमंद था, जो हमेशा साथ रहता था। उसे वफादारी के प्रतीक के तौर पर याद किया जाने लगा। कहा जाता है कि उसने कई बार छत्रपति को खतरों के बारे में आगाह किया। मिक्स ब्रिड का श्वान वाघ्या ने एक बार घर में घुसे दुश्मनों को देखकर जोर-जोर से भौंकने लगा, जिसे सुनकर सो रहे शिवाजी जाग गए। उन्होंने हमलावरों को महल में खत्म कर दिया।

2100 में भी हो चुका है वाघ्या पर विवाद

रिपोर्टस के अनुसार, पहले रायगढ़ के किले में वाघ्या का स्मारक नहीं था। 1906 में इंदौर के राजकुमार तुकोजी होल्कर से मिले दान के बाद शिवाजी की समाधि के पास वाघ्या की प्रतिमा लगवाई गई। 2011 में भी यह मुद्दा पहली बार गरमाया, तब संभाजी ब्रिगेड ने वाघ्या की प्रतिमा को हटा दिया। बाद में धनकर समाज के विरोध के बाद इसे दोबारा लगाया गया।


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