पुणे में लोगों पर हिंदी बोलने का प्रेशर, शरद पवार ने कर दी मराठी को अनिवार्य करने की मांग

पुणे: एनसीपी (एसपी) के प्रमुख ने महाराष्ट्र के कई शहरों में के बजाय हिंदी बोले जाने पर चिंता जताई है। पुणे में आयोजित अखिल भारतीय में उन्होंने कहा कि मराठी को संरक्षित करने के लिए जरूरी है कि इसे अनिवार्य किया जाए। उन्होंने कहा कि पुणे और इसके आसपास के इलाकों में मराठी नहीं बोली जा रही है बल्कि हिंदी बोलने पर जोर दिया जाता है। उन्होंने साहित्यकारों और लेखकों से राज्य की समस्याओं पर लिखने का अनुरोध भी किया।क्यों बन रहा है हिंदी बोलने का प्रेशर? शरद पवार ने एक बार फिर मराठी अस्मिता की राजनीति को हवा दी है। एनसीपी (एसपी) के नेता शरद पवार ने पुणे साहित्य सम्मेलन में शनिवार को हिंदी-मराठी भाषा को लेकर अपनी राय रखी। 98वें अखिल भारतीय मराठी साहित्य सम्मेलन शरद पवार ने पुणे शहर में भी मराठी भाषा के कम होते इस्तेमाल पर दुख जताया। पवार ने कहा कि सदशिवराव पेशवा के दिल्ली पर कब्ज़ा करने के बाद कई मराठी लोग दिल्ली में बस गए थे। आज भी उनके वंशजों के घरों में छत्रपति शिवाजी महाराज की तस्वीरें देखी जा सकती हैं। महाराष्ट्र का गौरव संरक्षित है। पवार ने कहा कि आजकल पुणे में भी मराठी नहीं बोली जाती। पुणे के उपनगरों में रहने वालों पर भी हिंदी बोलने का प्रेशर है। उन्होंने कहा कि मराठी भाषा के संरक्षण के लिए इसे अनिवार्य बनाना ज़रूरी है।लेखक खत्म करे भाषा का संकटपुणे का उदाहरण देते हुए शरद पवार ने कहा कि महाराष्ट्र संकट के दौर से गुजर रहा है। उन्होंने लेखकों से अपने साहित्य के माध्यम से इस संकट को खत्म करने की अपील की। एनसीपी नेता ने विश्वास जताया कि महाराष्ट्र जल्द ही अपनी पुरानी स्थिति में लौट आएगा। इस कार्यक्रम में महाराष्ट्र साहित्य परिषद के अध्यक्ष डॉ. रावसाहेब कसबे, न्यास मंडल के अध्यक्ष डॉ. शिवाजीराव कदम, कार्यकारी अध्यक्ष प्रोफेसर मिलिंद जोशी, पुणे के संस्थापक अध्यक्ष संजय नाहर, सम्मेलन के संयोजक डॉ. सदानंद मोरे, मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुनीताराजा पवार, सरहद के कोषाध्यक्ष विनोद कुलकर्णी और न्यासी शैलेश वाडेकर भी उपस्थित थे।


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