म्यांमार के गृहयुद्ध से रोहिंग्या मुस्लिमों के लिए नरक बनी जिंदगी... हिंसा के बाद बांग्लादेश भागे, लाश उठाने का भी वक्त नहीं

नेपीडा: म्यांमार में लगातार भीषण होते गृह युद्ध से रोहिंग्या मुस्लिम बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। रखाइन राज्य में अराकान आर्मी और म्यांमार की जुंटा सेना के बीच लड़ाई के चलते हजारों रोहिंग्या और दूसरे अल्पसंख्यक देश छोड़ने को मजबूर हुए हैं। म्यांमार छोड़कर ये लोग पड़ोसी देश बांग्लादेश में शरण ले रहे हैं। हिंसा के बीच जीरो पॉइंट और टॉम्ब्रू इलाकों में चार से पांच हजार रोहिंग्या, चकमा और बरुआ लोग किसी तरह सीमा पार करने की कोशिश में फंसे हुए हैं। ये लोग रात में दलालों की मदद से बांग्लादेश में घुसने की कोशिश करते हैं। कई बार इनको कामयाबी मिलती है तो कई दफा बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) इनको पकड़कर वापस भेज देते हैं।डिप्लोमैट ने अपनी रिपोर्ट में म्यांंमार की दो रोहिंग्या महिलाओं- हुमैरा और सलमा बीबी की कहानी बताई है। हुमैरा ने अपने बेटे को इस संघर्ष में खो दिया, वहीं सलमा के पति को मार दिया गया। दोनों महिलाएं भी अपने बच्चों के साथ घायल हुईं और किसी तरह देश छोड़ने में कामयाबी पाई। लड़ाई के चलते उनको देश छोड़ने के बाद बांग्लागेश में भी इनके सामने चुनौतियों का अंबार है।

'अराकान आर्मी ने गांव छोड़ने के लिए कहा'

हुमैरा हादिर बताती हैं, 'हमें अराकान आर्मी ने मार्च में गांव छोड़ने के लिए कहा था। हमने गांव छोड़ा और नोल बोइन्ना में शरण ली। इसके बाद हम माउंग्नी फारा और फिर हरि फारा गए। हरि फारा में जिस स्कूल में उन्होंने शरण ली थी, उस पर भी बमबारी हो गई। आखिरकार बांग्लादेश भागने का फैसला लिया और इसके लिए मैंने दलालों को प्रति व्यक्ति 550,000 क्यात (म्यांमार करेंसी) दिए।'हुमैरा आगे कहती हैं, 'बॉर्डर पार करने की कोशिश के दौरान भी अराकान आर्मी का हमला हमारे ऊपर हुआ। इसमें मेरे 9 साल के बेटे और उसके चाचा की मौत हो गई। उनकी लाश को आखिरी बार देखने बिना मुझे भागना पड़ा। बहुत दर्द झेलने के बाद आखिरकार 2 नवंबर को हम बांग्लादेश पहुंचे।' अब हुमैरा बांग्लादेश में हैं लेकिन यहां भी अपने बच्चों की देखभाल और पति के इलाज के लिए पैसे जुटाने के लिए संघर्ष कर रही है। वह म्यांमार से बाहर हैं लेकिन मुश्किल खत्म नहीं हुई है।

सलमा ने पति को खोया

एक और रोहिंग्या महिला सलमा बीबी माउंगडॉ के हरि फारा की रहने वाली हैं। उन्होंने 10 अगस्त को अपने परिवार के साथ म्यांमार से भागने का फैसला किया। वह कहती हैं, 'अराकान आर्मी ने लगातार यातनाएं दीं तो हमारे पास घर छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। हम पहले कुणार फारा, फिर दरगवा फारा और फिर जम बोइन्ना के कैंप बेस में गए। यहां भी स्थिति बिगड़ी तो हमने बांग्लादेश आने का फैसला किया लेकिन ये भी आसान नहीं रहा। इसके लिए हमने दलालों को बॉर्डर पार कराने के लिए बड़ी रकम दी और कई दिन बिस्किट खाकर गुजारा किया।' सलमा बताती हैं कि बॉर्डर पार करने की कोशिश में ही उनके पति दिल मोहम्मद मारे गए। वह बताती हैं कि पति की लाश छोड़कर वह किसी तरह अपने बच्चों के साथ बांग्लादेश आईं। फिलहाल सलमा बांग्लादेश में अपने पति के बिना जीवन फिर से शुरू करने की कठिन चुनौती का सामना कर रही हैं। म्यांमार में सलमा और हुमैरा अकेली नहीं है, उनकी तरह हजारों अल्पसंख्यक मानवीय संकट का सामना कर रहे हैं।


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