50 साल उर्दू शायरी में छाए रहे खुमार, बाराबंकी से अमेरिका तक थे उनके मुरीद

चंद्रकांत मौर्य, बाराबंकी: मशहूर शायर मो.हैदर खां उर्फ ने अपनी शायरी के दम पर बाराबंकी का नाम पूरी दुनिया में खूब रोशन किया। खुमार ने मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री और विदेश में अपने तरन्नुम से बड़े से बड़े मुशायरों में खूब वाहवाही पाई। उनके लिखे फिल्मी गाने आज भी लोगों की जुबान पर चढ़े हुए हैं। खुमार का जन्म 15 सितंबर 1919 को बाराबंकी में हुआ था।बात 1937 की है। खुमार उस समय जीआईसी में 11वीं के छात्र थे। कॉलेज के शिक्षक और उस्ताद शायर इकबाल अजीम और नूर नारवी ने ऑल इंडिया मुशायरे का आयोजन किया था, जिसमें उस दौर के नामचीन शायर आरजू लखनवी, सफी लखनवीं और जाफर अली नकवी असर को बुलाया गया था। इस दौरान खुमार ने शायरी पढ़ने का इजहार किया। इजाजत मिली तो उन्होंने वालिद बहार बाराबंकवी और चाचा करार बाराबंकवी से सीखी शायरी पढ़ी, एक शोला-सा गिरा शीशे से मेरे पैमाने में, लो किरन फूटी सबेरा हुआ मयखाने में। खुमार की चंद लाइनों ने मुशायरे में आए लोगों को दीवाना बना दिया। उस मुशायरे से मिली तालियों ने खुमार का हौसला इस कद्र बढ़ाया कि वे पढ़ाई छोड़ शेरों-शायरी में लग गए। उस दौर के महबूब शायर जिगर मुरादाबादी के तरन्नुम अंदाज(शायरी को गाने के अंदाज में पढ़ने की विधा) को अपना कर उन्होंने खुमार ने बड़ा मुकाम बनाया।

बारादरी,साज और आवाज, शंहशाह के लिए लिखे गाने

मो.हैदर को 1950 तक खुमार बाराबंकवी का तखल्लुस (उपनाम) मिल चुका था। इस उभरते शायर को उस दौर के प्रसिद्ध फिल्मकार एआर कारदार ने मुंबई बुला लिया। उनकी फिल्म बारादरी, साज और आवाज व शहंशाह फिल्म के लिए खुमार ने गाने लिखे। इन गानों का संगीत नौशाद ने दिया। इन गानों की कामयाबी से खुमार ने मायानगरी में खूब नाम कमाया लेकिन वे फिल्म इंडस्ट्री में ज्यादा दिन टिक नहीं सके और वापस लौट आए। फिर उनको अमेरिका, इंग्लैंड, शारजहां, पाकिस्तान में होने वाले मुशायरों में बुलाया जाने लगा। 1995 में यूपी के राज्यपाल रहे मोतीलाल बोरा ने उनकी शान में बाराबंकी की पुलिस लाइन्स में जश्न-ए-एक खुमार कार्यक्रम आयोजित कर उन्हें सम्मान से नवाजा। खुमार साहब की शायरी में मोहब्बत, इंसानियत और समाज की बातें हुआ करती थीं। उनकी गजलें और नज्म से लोग मुशायरों में झूम उठते थे। 20 फरवरी 1999 को लोगों में खुमार पैदा करने वाला यह शायर दुनिया को अलविदा कह गया। अपने प्रिय शायर की याद में रविवार को मुगलदरबार में एक मुशायरा होगा, जिसमें देश के बड़े शायरों को बुलाया गया है।


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