रूस और चीन चांद पर बनाएंगे न्यूक्लियर रिएक्टर, नासा से आगे निकलने की तैयारी, क्या है प्लान?

मॉस्को: रूसी स्पेस एजेंसी रोस्कोस्मोस ने 2030 के दशक में चंद्रमा पर एक ऑटोमैकिट परमाणु रिएक्टर बनाने के लिए चीन के साथ काम करने के प्लान की घोषणा की है। ये रिएक्टर चंद्रमा बेस को बिजली देने में मदद करेगा, जिसे दोनों देश संयुक्त रूप से संचालित करेंगे। 2021 में रोस्कोसमोस और चीन राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रशासन (CNSA) ने खुलासा किया कि उनका लक्ष्य चंद्रमा पर मिलकर एक बेस बनाने का है। इस बेस का नाम अंतर्राष्ट्रीय चंद्र अनुसंधान स्टेशन (ILRS) होगा। उस समय चीन ने दावा किया था कि यह सभी इच्छुक देशों और अंतर्राष्ट्रीय भागीदारों के लिए खुला है।हालांकि CNSA के साथ खराब ऐतिहासिक संबंधों और रोस्कोस्मोस के साथ हालिया तनाव के कारण नासा के अंतरिक्ष यात्रियों को शायद ही इस बेस पर जाने की इजाजत मिले। दरअसल यूक्रेन पर हमले के बाद रूस पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगाए। प्रतिबंधों के जवाब में रूसी स्पेस एजेंसी ने 2025 तक इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन छोड़ने का फैसला किया है। मंगलवार को रोस्कोस्मोस ने घोषणा की है कि वह चीन के साथ एक परमाणु रिएक्टर बनाने का प्रयास करेगा, जो चांद के बेस पर बिजली देगा।

रूस-चीन बनाएंगे परमाणु रिएक्टर

रोस्कोस्मोस के महानिदेशक यूरी बोरिसोव ने कहा, 'हम अपने चीनी सहयोगियों के साथ मिलकर चंद्रमा की सतह पर 2033-2035 तक एक बिजली यूनिट स्थापित करने की योजना पर विचार कर रहे हैं।' बोरिसोव ने कहा कि यह चुनौतीपूर्ण कार्य संभवतः मनुष्यों की उपस्थिति के बिना ऑटोमैटिक तरीके से किया जाएगा। इससे जुड़े आवश्यक टेक्नोलॉजिकल सॉल्यूशन लगभग तैयार हैं। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक रोस्कोस्मोस इस बेस को बनाने के लिए चंद्रमा पर माल ट्रांसपोर्ट करने के लिए बड़े पैमाने पर परमाणु संचालित रॉकेटों के इस्तेमाल पर विचार कर रहा है।

चीन-रूस ने नहीं पहुंचाए इंसान

हालांकि रूसी अंतरिक्ष एजेंसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि उन्हें यह नहीं पता इसे कैसे बनाया जाए। वैज्ञानिक मानते हैं कि परमाणु रिएक्टर चंद्रमा के बेस के लिए जरूरी होगा, क्योंकि सौर पैनल के लिए पर्याप्त ऊर्जा बनाने और उनका संग्रह करना संभव नहीं होगा। रोस्कोस्मोस और CNSA में से किसी ने भी मनुष्यों को चंद्रमा की सतह पर भी नहीं भेजा है। इसके अलावा रूस चंद्रमा के मिशन में पिछले साल फेल भी हो चुका है। हालांकि चीन 2013 से ही अपने लैंडर और रोवर सतह पर पहुंचा चुका है।


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