दिल्ली में बड़ा हॉल नहीं था और नेहरू पेरिस में घोषणा कर आए थे, पढ़िए कहानी विज्ञान भवन की

नई दिल्ली: दिल्ली के प्रगति मैदान में बने कन्वेंशन सेंटर 'भारत मंडपम' का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उद्घाटन किया। इस साल देश में होने वाला जी-20 शिखर सम्मेलन इसी कन्वेंशन सेंटर में होगा। अब तक दिल्ली में आयोजित सभी बड़ी बैठकें और कार्यक्रम विज्ञान भवन में ही होते थे। भारत मंडपम का तो उद्घाटन अभी हुआ है लेकिन विज्ञान भवन अपने भीतर एक बड़ा इतिहास समेटे हुए है। विज्ञान भवन कई दशकों से तमाम ऐतिहासिक सम्मेलनों और बैठकों का गवाह बना हुआ है।पेरिस में बैठक की घोषणा कर आए थे नेहरू, इससे जुड़ी एक दिलचस्प कहानी है। पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू 1995 में पेरिस के यूनेस्को शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने गए थे। इस दौरान उन्होंने यूनेस्को में भारत की राजधानी दिल्ली में अगली बैठक करने का निवेदन किया। यूनेस्को ने भी पंडित नेहरू का निवेदन स्वीकार कर लिया और दिल्ली में बैठक करने को राजी हो गए।दिल्ली में नहीं था कोई बड़ा मीटिंग हॉललेकिन जब पीएम नेहरू दिल्ली लौटे तो वो अपने मंत्रियों और अधिकारियों से ये जानकर हैरान रह गए कि राजधानी में तो इंटरनेशनल सम्मेलन की मेजबानी करने के लिए कोई बड़ा हॉल ही नहीं था। इसके बाद नेहरू ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि वो जल्द नए कन्वेंशन हॉल के लिए जगह चुनें। केंद्रीय लोक निर्माण विभाग के आर.ए गेहलोते ने नए कन्वेंशन सेंटर के डिजाइन को अंतिम रूप दिया। विज्ञान भवन के लिए 4 एडवर्ड रोड बंगला चुना गया, यहां मौलाना अबुल कलाम आजाद स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री के रूप में रहते थे। इसका नाम बाद में बदलकर मौलाना आजाद रोड कर दिया गया। कॉन्फ्रेंस हॉल के लिए रास्ता बनाने के लिए इसे गिरा दिया गया। यकीनन, विज्ञान भवन आजादी के बाद शहर में बनी पहली बड़ी इमारत थी।विज्ञान भवन में क्या-क्या बनाया?गेहलोते ने विज्ञान भवन को डिजाइन करने के लिए ब्रिटिश, हिंदू, बौद्ध और मुगल वास्तुकला को शामिल किया। उन्होंने 1,200 से ज्यादा प्रतिनिधियों के बैठने के लिए एक बड़ा हॉल बनाने की योजना बनाई और कम प्रतिनिधियों के बीच बैठकों के लिए छह छोटे हॉल भी बनाए। इसके अलावा इस परिसर में एक वीआईपी लाउंज, कॉन्फ्रेंस ऑफिस और सचिवालय, एक प्रदर्शनी हॉल, एक स्टूडियो और एक व्यापार केंद्र को बनाया गया। बाद में विज्ञान भवन एनेक्सी को उपराष्ट्रपति भवन के निकट बनाया गया।तांबो से बनी पेंटिंग्स ने जीता सबका दिलNDMC के पूर्व डायरेक्टर मदन थपलियाल ने एक बार याद करते हुए बताया था कि जब इमारत तैयार हो गई तो आर्टिस्ट अमर नाथ सहगल को यहां पेंटिंग्स डिजाइन करने का काम दिया गया। उनके तांबे से बनाई गई पेंटिंग्स ने हॉल में आने वाले हर किसी को प्रभावित किया। भारत में आए मेहमानों पर इन पेंटिंग्स ने अमिट छाप छोड़ी। विज्ञान भवन में पेंटिंग्स का डिजाइन 1959 में केंद्रीय कार्य आवास और आपूर्ति मंत्रालय ने शुरू किया था, जिसे प्रधानमंत्री नेहरू ने अप्रूव किया था। 1962 में ये काम पूरा हुआ था। विज्ञान भवन में बनी पेंटिंग्स 140 फीट लंबी और 40 फीट ऊंची थी। इसमें तांबे से भारत के किसान, कारीगर, महिलाओं और बच्चों को दर्शाया गया था। उत्सवों के दौरान लगे हुए थे।यहां हुईं कई बड़ी मीटिंग और सम्मेलनविज्ञान भवन में सबसे बड़ी बैठक 1983 में कॉमनवेल्थ हेड्स ऑफ गवर्नमेंट मीटिंग (CHOGM) और गुटनिरपेक्ष आंदोलन के 7वें शिखर सम्मेलन को माना जा सकता है। इसके अलावा क्यूबा के राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो को कौन भूल सकता है, जिन्होंने यहीं एक कार्यक्रम में शामिल 100 नेताओं के शिखर सम्मेलन में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को गले लगाया था।JNU की शुरुआत यहीं हुईवर्षों तक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन भी विज्ञान भवन में ही होते रहे हैं। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) की शुरुआत भी यहीं हुई। जब भारत सरकार ने 28 अप्रैल 1969 को गोपालस्वामी पार्थसारथी को जेएनयू का पहला कुलपति नियुक्त किया, तो उन्हें विज्ञान भवन में एक अस्थायी कार्यालय दिया गया। पार्थसारथी ने रोमिला थापर, बिपन चंद्रा टैन चुंग जैसे दिग्गजों से यहीं और उन्हें नई यूनिवर्सिटी में शामिल होने के लिए राजी किया।शिखर सम्मेलनों और बैठकों के अलावा, प्रसिद्ध गजल गायिका बेगम अख्तर ने 1974 में 15 अक्टूबर की ठंड के दिनों में विज्ञान भवन में अपना अंतिम संगीत कार्यक्रम किया था। उन्होंने यहीं 'आप कहते थे कि रोने से ना बदलेंगे नसीब, ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया और ये ना थी हमारी किश्मत'गजल गाकर समां बांधा था। इस कार्यक्रम के महज 15 दिनों के बाद अहमदाबाद में उनका निधन हो गया।


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