छह महीने में चल बसी थीं मां, विसनगर से वडनगर तक हीराबा के हिम्मत और संघर्ष की दास्तां

अहमदाबाद: हीराबा ने शनिवार सुबह 3:30 बजे अहमदाबाद के यूएन मेहता अस्पताल में आखिरी सांस ली। इसके गांधीनगर के सेक्टर 30 में बेहद सादगीपूर्ण तरीके से दी गई। हिंदू रीति-रिवाज से उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस मौके पर परिवार के सभी अहम सदस्य मौजूद रहे। 18 जून, 1923 को जन्मी ने एक असाधारण यात्रा पूरी की। हीराबा का जन्म पालनपुर में हुआ। वे जब छह महीने की थीं, तभी उन्होंने मां को खो दिया। हीराबा इसके बाद बिना मां के प्यार के विसनगर में बड़ी हुईं। खुद को संभालने के साथ उन्होंने अपनी दूसरी मां के बच्चों की परवरिश की। बचपन से ही तमाम जिम्मेदारियों से घिरने वाली हीराबा शायद इन्हीं बंधनों के चलते स्कूल नहीं जा पाईं। वडनगर आईं हीराबा करीब 15-16 साल की आयु में हीराबा वडनगर के मोदी परिवार की बहू बनीं। पीएम मोदी के पिता दामोदरदास मूलचंद मोदी के साथ वे विवाह बंधन में बंधी। पीएम मोदी के पिता दामोदरदास मोदी पांच भाई थे। इसमें दामोदरदास सबसे बड़े थे। इसके चलते हीराबा इस परिवार की सबसे बड़ी बहू थीं। यहां भी उन्हें शुरुआत से जिम्मेदारियों का उठाना पड़ा। हीराबा ने इसके बाद पांच बेटों और एक बेटी को जन्म दिया। इनमें सोमाभाई मोदी, अमृतभाई मोदी, नरेंद्र मोदी, प्रहलाद मोदी और पंकज मोदी और वासंतीबेन मोदी शामिल हैं। संघर्ष से किया सबको बड़ा हीरा बा ने पांच बेटों और बेटी को कड़े संघर्ष से बड़ा किया। खुद प्रधानमंत्री मां के संघर्ष का बताते रहे हैं। हीराबा ने घर का खर्च चलाने के लिए दूसरों के घर के बर्तन भी धुले। वे समय निकालकर चरखा भी चलाया करती थीं क्योंकि उससे भी कुछ पैसे जुट जाते थे। मोदी परिवार के ऊपर पहली बड़ी विपत्ति तब आई जब 1989 में पीएम मोदी के पिता दामोदरदास का निधन हो गया। इसके बाद पूरे परिवार को संभालने की जिम्मेदारी हीराबा पर आ गई। बेटे बड़े हो गए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस वक्त पर बीजेपी में सक्रिय हो चुके थे। हीरा बा नरेंद्र मोदी के चितिंत रहती थीं। इसके बाद तीन दशक तक हीराबा सभी बेटों के लिए ऊर्जा का स्रोत बनी रहीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब 1991 के आखिर में एकता यात्रा पर गए तो हीराबा फगवाड़ा में आंतकी हमला होने पर बेचैन हो गई थीं। बेटे की सलामती के लिए उन्होंने फोन किया और खुद को तसल्ली दी थी, हालांकि पीएम मोदी तब सुरक्षित वापस लौटे थे और उनका अहमदाबाद में स्वागत किया गया तो पहली बार हीराबा सार्वजनिक तौर पर इस कार्यक्रम में पहुंची थीं। बेटों को दिए बड़े संस्कार अहमदाबाद के अस्पताल में जब हीराबा ने अंतिम सांस ली तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लिखा कि शानदार शताब्दी का ईश्वर चरणों में विराम... मां में मैंने हमेशा उस त्रिमूर्ति की अनुभूति की है, जिसमें एक तपस्वी की यात्रा, निष्काम कर्मयोगी का प्रतीक और मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध जीवन समाहित रहा है। निश्चित तौर हीराबा ने अपने त्याग और संघर्ष से एक बड़ी लकीर खींची। उन्होंने अपने सभी बेटों में राष्ट्र्रप्रेम, राष्ट्रभावना और ईमानदारी के गुणों के साथ कई अन्य संस्कार दिए। अंतिम वक्त तक रहीं सक्रिय हीरा बा अपने जीवन के अंतिम दिनों तक सक्रिय रहीं। जीवन के सौवें वर्ष में प्रवेश के बाद भी चाहे तिरंगा यात्रा का आयोजन हो या फिर चुनावों में मतदान की बात। हीराबा ने हर कर्तव्य को पूरा किया। 30 दिसंबर को उन्होंने अंतिम सांस ली, लेकिन इसी महीने हुए गुजरात चुनावों में हीरा बा वोट डालने पहुंचीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब इसी साल 18 जून को मां के लिए ब्लॉग लिखा था तो उसमें लिखा था कि आज अगर मैं अपनी मां और अपने पिता के जीवन को देखूं, तो उनकी सबसे बड़ी विशेषताएं रही हैं ईमानदारी और स्वाभिमान। गरीबी से जूझते हुए परिस्थितियां कैसी भी रही हों, मेरे माता-पिता ने ना कभी ईमानदारी का रास्ता छोड़ा ना ही अपने स्वाभिमान से समझौता किया। उनके पास हर मुश्किल से निकलने का एक ही तरीका था- मेहनत, दिन रात मेहनत। पिताजी जब तक जीवित रहे उन्होंने इस बात का पालन किया कि वो किसी पर बोझ नहीं बनें। मेरी मां आज भी इसी प्रयास में रहती हैं कि किसी पर बोझ नहीं बनें, जितना संभव हो पाए, अपने काम खुद करें। आज भी जब मैं मां से मिलता हूं, तो वो हमेशा कहती हैं कि “मैं मरते समय तक किसी की सेवा नहीं लेना चाहती, बस ऐसे ही चलते-फिरते चले जाने की इच्छा है”। हीराबा ने संपूर्ण जीवन में सादगी को अपनाया। शायद यही वजह रही कि पीएम मोदी ने मां की इच्छा के अनुरुप उनके अंतिम संस्कार को सादगीपूर्ण ही रखा।


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