चुनाव नजदीक आते ही मोदी-शाह का कट्टर हिंदुत्व कार्ड, क्या है बीजेपी का मिशन गुजरात?

अहमदाबाद: गुजरात में पहले चरण के चुनाव में दो दिन बचे हैं और सत्तारूढ़ बीजेपी ने पूरी तरह से कट्टर हिंदुत्व कार्ड चल दिया है। रविवार को खेड़ा में रैली के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगाया। पीएम मोदी ने कहा कि कांग्रेस और दूसरे दल आतंकवाद पर चुप्पी साधते हैं ताकि उनके वोट बैंक को ठेस न पहुंचे। पीएम मोदी ने खेड़ा रैली के दौरान 2008 मुंबई आतंकी हमला, बाटला हाउस एनकाउंटर, अहमदाबाद और सूरत सीरियल ब्लास्ट का जिक्र किया। पीएम मोदी ने कहा कि अगर तुष्टिकरण की राजनीति चलती रही तो भारत आतंकवाद का सामना करता रहेगा। इससे पहले गृहमंत्री अमित शाह ने कांग्रेस पर वोटबैंक की राजनीति और कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने, अयोध्या में राम मंदिर और समान नागरिक संहिता लागू करने का आह्वान किया था। एक रैली में उन्होंने 2002 गुजरात दंगों का भी जिक्र कर कहा था कि कैसे दंगाइयों को उस वक्त सबक सिखाया गया था। जीत का अपना रिकॉर्ड तोड़ना चाहती है बीजेपी पिछले कुछ दिन से बीजेपी के चुनावी तेवरों में बदलाव इस ओर इशारा करता है कि पार्टी गुजरात में अपने 127 सीटों के रिकॉर्ड को तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है। गुजरात की 53 सीटों पर मुस्लिम वोटर्स 10 से 61 फीसदी तक हैं और इन्हीं सीटों पर वोटिंग यह तय करेगी कि बीजेपी अपना पिछला रिकॉर्ड तोड़ पाती है या नहीं। 76 शहरी निर्वाचन क्षेत्रों में बीजेपी का दबदबा एक निष्कर्ष है। इनमें से मुस्लिम बहुल सीटें भी शामिल हैं जैसे- खड़िया-जमालपुर, दरियापुर-कालुपुर, दानिलिमदा, वेजलपुर और बापूनगर सीट। यहां मुस्लिम आबादी तकरीबन 20 फीसदी से 61 फीसदी है। इसी तरह की स्थिति सौराष्ट्र के वांकानेर, सोमनाथ, द्वारका और खंभालिया में, कच्छ के अबडासा, मांडवी और भुज, उत्तर गुजरात के वडगाम और सिद्धपुर, अहमदाबाद के ढोलका, पंचमहल के गोधरा, भरूच जिले के भरूच, वागरा और जंबुसर में, खेड़ा के मटर, मेहमदाबाद, महुधा, सूरत के लिंबायत और सूरत पूर्व में है। इस बार मुसलमानों का वोट किसे? बड़ा सवाल यह है कि इस बार मुस्लिम कैसे वोट करेंगे? क्या वे आप की तरफ आकर्षित होंगे या फिर एआईएमआईएम या कांग्रेस को वोट देंगे? कांग्रेस का आरोप है कि बीजेपी मुस्लिम वोटों को बांटने की कोशिश कर रही है। उदाहरण के तौर पर सूरत पूर्व में 14 में से 12 उम्मीदवार मुस्लिम हैं। लिंबायत में कुल 44 में से 36 मुस्लिम उम्मीदवार हैं। अहमदाबाद के बापूनगर में 29 में से 9 मुस्लिम कैंडिडेट हैं। जमानपुर-खड़िया में आठ में से 4 और दरियापुर में 7 में से 4 उम्मीदवार मुस्लिम हैं। 2017 में इन 53 मुस्लिम बहुल सीटों में से बीजेपी ने 28 पर और कांग्रेस ने 25 पर जीत दर्ज की थी। बीजेपी का गेम प्लान मुस्लिम वोटों के बंटवारे और हिंदू वोटों को बनाए रखने पर टिका है। मुस्लिम वोट अक्सर उन उम्मीदवारों को जाते हैं जिनके जीतने की संभावना है और जो भविष्य में उनके लिए मददगार साबित हों। केजरीवाल ने खोई अपनी साखओवैसी की कट्टर अल्पसंख्यक राजनीति पश्चिम बंगाल और यूपी में अब तक फेल रही है। केजरीवाल ने नोटों पर गणेश-लक्ष्मी की तस्वीर लगाने की अपील के साथ यूनिफॉर्म सिविल कोड, नवरात्रि के दौरान मुस्लिम युवकों की पिटाई, बेट द्वारका में मुस्लिम के अधिक्रमण को गिराना और बिल्किस बानो के दोषियों की रिहाई मामले पर चुप्पी से अल्पसंख्यकों के बीच अपनी धर्मनिरपेक्ष साख खो दी है। किसी पार्टी की जीत तय करने में वोट फीसदी महत्वपूर्ण है। जब कोई विशेष समुदाय या समूह किसी विशेष राजनीतिक दल को सामूहिक रूप से वोट देने का फैसला करता तो यह आमतौर पर उलटा असर दिखाता है। उदाहरण के लिए, हाल के दिनों में जब एक मौलवी ने मतदाताओं को कांग्रेस के पक्ष में वोट करने और बीजेपी के कौशिक पटेल को हराने की अपील की तो उन्हें हिंदू प्रतिक्रिया का सामना करना पड़ा और कौशिक पटेल बहुत कम अंतर से जीत गए। निष्कर्ष यह है कि चुनाव सिंगल फैक्टर नहीं बल्कि कई फैक्टर पर तय होते हैं।


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