Explainer: कार्बन डेटिंग क्या है, जिसपर ज्ञानवापी-श्रृंगार गौरी मामले में विवाद शुरू हो गया है?

नई दिल्ली: ज्ञानवापी-शृंगार गौरी मामले में पिछले सप्ताह अदालत ने ज्ञानवापी मस्जिद के वजूखाने में मिले कथित शिवलिंग की कराने की हिन्‍दू पक्ष की मांग का संज्ञान लेते हुए मुस्लिम पक्ष से आपत्ति मांगी है। इस मामले में 29 सितंबर को अगली सुनवाई होनी है। हालांकि इस सुनवाई से पहले ही कार्बन डेटिंग को लेकर विवाद छिड़ गया है। पांच महिला वादियों में से एक राखी सिंह ने कार्बन डेडिंग का विरोध किया है। इस विरोध के पीछे तर्क दिया गया है कि यदि कार्बन डेटिंग कराई जाती है तो इसका मतलब है कि आदि विश्वेश्वर के शिवलिंग पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहे हैं। इस विवाद के बीच यह भी समझना जरूरी है कि आखिर कार्बन डेटिंग है क्या? कार्बन डेटिंग है क्या? मान लीजिए कोई पुरातात्विक खोज की जाती है या वर्षों पुरानी कोई मूर्ति मिल जाती है तो कैसे पता चलेगा कि वह कितनी पुरानी है। कार्बन डेटिंग वो विधि है जिसकी सहायता से उस वस्तु की उम्र का अंदाजा लगाया जाता है। कार्बन डेटिंग से उम्र की गणना की जाती है इसे एप्सोल्युट डेटिंग भी कहा जाता है। इसको लेकर भी कई सवाल है कई बार यह इससे भी सही उम्र का अंदाजा नहीं लग पाता है। हालांकि इसकी सहायता से वर्ष की सीमा का पता लगाया जा सकता है। कार्बन डेटिंग के तरीके को ऐसे समझें कार्बन डेटिंग के तरीके को ऐसे समझा जा सकता है। वायुमंडल में कार्बन के 3 आइसोटोप मौजूद हैं। यह पृ्थ्वी के प्राकृतिक प्रक्रियाओं के हिस्से के रूप में होते हैं। कार्बन के यह तीन रूप हैं- कार्बन 12, कार्बन 13 और कार्बन 14। कार्बन डेटिंग के लिए कार्बन 14 की आवश्यकता होती है। इसमें कार्बन 12 और कार्बन 14 के बीच अनुपात निकाला जाता है। कार्बन 14 कार्बन का रेडियोधर्मी आइसोटोप है इसका अर्धआयुकाल 5730 साल से भी अधिक का है। यह विधि कई कारणों से विवादों में भी रही है। वैज्ञानिकों के मुताबिक रेडियो कार्बन का जितनी तेजी से क्षय होता है उससे 27 से 28 प्रतिशत ज्यादा इसका निर्माण होता है जिससे संतुलन की अवस्था प्राप्त होना मुश्किल होता है। कब हुई थी इस तकनीक की खोज कार्बन डेटिंग की तकनीक का इस्तेमाल भारत ही नहीं दुनिया के अधिकांश देशों में किया जाता है। इस तकनीक की खोज1949 में शिकागो यूनिवर्सिटी के विलियर्ड लिबी ने की थी। इस विधि के जरिए सबसे पहले एक लकड़ी की उम्र का पता लगाया गया था। इस खोज के लिए विलियर्ड लिबी को साल 1960 में नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। उठते रहे हैं सवाल पुरानी चीजों की उम्र पता करने के लिए कार्बन डेटिंग का तरीका आजमाया जाता है लेकिन इसकी कुछ सीमाएं हैं। टेराकोटा की मूर्ति की उम्र का अंदाजा इसके जरिए नहीं लगाया जा सकता है। ऐसे में उम्र पता करने के लिए इनकी आकृति, लिखावट, भाषा के जरिए पता की जाती है। इसके लिए खास एक्सपर्ट्स होते हैं। ऐसा मुमकिन है कि अलग-अलग एक्सपर्ट्स के हिसाब से उम्र का हिसाब अलग-अलग भी हो।


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