पानी का पहरेदार: लक्ष्मण सिंह की लापोड़िया से शुरू हुई एक जलक्रांति, पढ़ें पद्मश्री से सम्मानित जल योद्धा की प्रेरणादायक कहानी

जयपुर: राजधानी के के दूदू क्षेत्र में लापोड़िया गांव के रहने वाले लक्ष्मण सिंह को दो साल पहले राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया। यह सम्मान उन्हें जल संरक्षण और पर्यावरण क्षेत्र में उनके चार दशक के योगदान के लिए मिला। उन्होंने जिस 'चौका तकनीक' से तालाबों को रिचार्ज किया और चारागाहों को पुनर्जीवित किया, उससे 50 से अधिक गांवों की तस्वीर बदल गई। लक्ष्मण सिंह ने जल संरक्षण के लिए जो आंदोलन शुरू किया, उसने आज 68 गांवों को नई दिशा दे दी है। दो साल पहले उन्हें मिलाकेवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस सोच का सम्मान था जो गांवों की मिट्टी से जुड़कर वहां की तस्वीर बदलने निकली थी।

18 साल की उम्र में ली धरती बचाने की जिम्मेदारी

महज 18 साल की उम्र में लक्ष्मण सिंह ने यह ठान लिया था कि गांव और धरती को बचाना है। वर्ष 1977 में उन्होंने के लिए श्रमदान शुरू किया और 1987 से 'धरती जतन यात्रा' के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का अभियान शुरू किया, जो आज भी जारी है।

बदलाव की शुरुआत एक से ही होती है

लक्ष्मण सिंह की कहानी इस बात का प्रमाण है कि अगर संकल्प और मेहनत हो, तो एक व्यक्ति भी सैकड़ों गांवों की किस्मत बदल सकता है। उनका जीवन हर उस युवा के लिए प्रेरणा है जो अपने गांव, समाज और पर्यावरण के लिए कुछ करना चाहता है।

जहां सूखा पड़ता वहां चौका तकनीक से गांवों में हरियाली

लक्ष्मण सिंह ने अपने गांव लापोड़िया से 'चौका तकनीक' की शुरुआत की। इस तकनीक के तहत वर्षाजल को संरक्षित करने के लिए भूमि को विशेष आकार में तैयार किया जाता है, जिससे पानी धीरे-धीरे जमीन में समा जाए। सबसे पहले उन्होंने अपने गांव के तालाब में यह तकनीक अपनाई, जिससे वहां का चारागाह हरा-भरा हो गया। इसका असर यह हुआ कि आस-पास के गांवों में भी यह मॉडल लोकप्रिय होने लगा।

नवयुवक मंडल से बढ़ाई मुहिम

लक्ष्मण सिंह ने 'नवयुवक मंडल लापोड़िया' के माध्यम से पानी बचाने और चारागाहों के विकास का संदेश फैलाया। उन्होंने न केवल जन-जागरूकता अभियान चलाया, बल्कि स्वयं श्रमदान कर गांवों को जोड़ने की पहल की। उनकी यह पहल एक आंदोलन बन गई जिसने ग्रामीणों को जल संरक्षण और पर्यावरण के प्रति जागरूक किया।

जल के साथ गायों की नस्ल सुधार पर भी ध्यान

सिर्फ पानी बचाना ही नहीं, लक्ष्मण सिंह ने पेड़-पौधे लगाने और गायों की नस्ल सुधार पर भी जोर दिया। उनके प्रयासों से 100 से अधिक गांवों में देशी नस्ल की गायों को बढ़ावा मिला। उनका उद्देश्य था कि पर्यावरण के साथ-साथ पशुपालन को भी स्थायी रूप से मजबूत किया जाए।

प्रेरणा बन चुके हैं लक्ष्मण सिंह

लक्ष्मण सिंह की यह यात्रा बताती है कि एक व्यक्ति की सोच और संकल्प अगर सही दिशा में हो, तो गांव, समाज और देश—तीनों की तस्वीर बदली जा सकती है। उनके काम आज भी युवाओं के लिए एक जीवंत प्रेरणा हैं।


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