5 साल में 3 CM फिर 27 साल का इंतजार, द‍िल्‍ली में क्यों खत्म नहीं हो रहा BJP का 'वनवास'?

नई दिल्ली: 27 साल। इस ढाई दशक में देश में काफी कुछ बदल गया। केंद्र में लगातार तीसरी बार पीएम नरेंद्र मोदी सरकार बनाने में कामयाब रहे। कभी देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस अब क्षेत्रीय दलों के सहारे है। एक नई पार्टी का उदय हुआ और देखते ही देखते दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो गई। वो भी धमाकेदार अंदाज में। इन 27 सालों में अगर कुछ नहीं बदला तो वो है दिल्ली में बीजेपी की फिर से ताजपोशी। BJP का ये इंतजार मोदी लहर में भी खत्म नहीं हुआ। वो भी तब जब बीजेपी दिल्ली में लोकसभा चुनावों में जीत की हैट्रिक लगा चुकी है। 2014, 2019 और अब 2024 में दिल्ली वालों ने सातों की सातों सीटें भारतीय जनता पार्टी की झोली में डाल दी थी। फिर आखिर क्यों दिल्ली में विधानसभा चुनाव की बात आती है तो दिल्लीवालों का दिल छोटा हो जाता है? 41 साल बाद जब 1993 में दिल्ली की जनता को अपना मुख्यमंत्री चुनने का अधिकार मिला तो उन्होंने बीजेपी पर ही भरोसा जताया। मगर उसके बाद से बीजेपी का 'वनवास' खत्म ही नहीं हुआ है।

5 साल में बदले बदले तीन मुख्यमंत्री

लंबे इंतजार के बाद 1993 में जब दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए, तो जनता ने बीजेपी को दिल खोलकर वोट द‍िए। 70 में से 49 सीटें जीतकर बीजेपी ने शान से सरकार बनाई। मदन लाल खुराना दिल्ली की पहली विधानसभा में मुख्यमंत्री बने। मगर 1996 में केंद्र में बीजेपी की सरकार पर जैन हवाला कांड के आरोप लगे। इसके छींटे खुराना तक भी आए। संकट बढ़ता देखकर खुराना ने इस्तीफा दे दिया और साहिब सिंह वर्मा को मुख्यमंत्री बनाया गया। मगर साहिब सिंह वर्मा के कार्यकाल वाली सरकार महंगाई को रोकने में नाकामयाब रही। जनता में असंतोष साफ दिखने लगा था। बीजेपी ने 1998 में एक बार फिर से सीएम बदलने का फैसला लिया और इस बार दिल्ली को सुषमा स्वराज के रूप में पहली महिला मुख्यमंत्री मिलीं। मगर तब तक अगले चुनाव का समय नजदीक आ चुका था।

फिर शुरू हुआ 'शीला युग'

1998 में बीजेपी जो एक बार सत्ता से बाहर हुई तो अब तक वापसी नहीं कर पाई है। कांग्रेस ने शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाया और पार्टी ने 52 सीटें जीतीं। सुषमा स्वराज के नेतृत्व में बीजेपी 49 सीटों से 15 सीटों पर आ गई। 2003 और 2008 में जनता ने कांग्रेस पर ही भरोसा जताया। इसके बाद दिल्ली के सियासी रण में एक नए चेहरे की एंट्री हो गई। वो नाम था अरविंद केजरीवाल। कॉमनवेल्थ घोटाले समेत भ्रष्टाचार के कई आरोप केंद्र में कांग्रेस सरकार पर लगने लगे। इसकी आंच शीला दीक्षित सरकार तक भी पहुंच गई। 2013 के व‍िधानसभा चुनाव में 15 साल से राज कर रहीं शीला दीक्षित अपनी सीट भी नहीं बचा सकीं। केजरीवाल के नेतृत्व में एक नई पार्टी ने 28 सीटें जीतकर सभी को चौंका दिया। बीजेपी ने 31 सीटें जीती और बहुमत से महज 5 सीट दूर रह गई। फिर दिल्ली की राजनीति में कुछ ऐसा हुआ, जिसकी कल्पना नहीं की गई थी। कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को सरकार बनाने के लिए समर्थन दे दिया। हालांकि यह अनूठा गठबंधन 2 साल ही चला, लेकिन बीजेपी के हाथों से एक बार कुर्सी फिसल गई। 2015, 2020 में पूरे देश में मोदी लहर होने के बावजूद आम आदमी पार्टी यहां एकतरफा जीत हासिल करती चली गई।

आखिर क्यों दिल्ली में नहीं चल रहा जादू

हर किसी के मन में सवाल उठ सकता है कि आखिर दिल्ली के दिल में क्या है? जिस पार्टी को वो लोकसभा चुनाव में सभी सातों सीटों पर जीत दिलाती है, उसी का साथ विधानसभा चुनाव में क्यों छोड़ देती है। दरअसल दिल्ली की कुछ विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जो एक तरह से यहां पर बीजेपी का भाग्य तय करने का काम कर रही हैं। दिल्ली की 70 सीटों में से 13 एससी आरक्षित सीटें हैं और कुछ ऐसी सीटें हैं, जहां मुस्लिम वोटर ज्यादा हैं। अभी तक बीजेपी इन सीटों पर जीत हासिल नहीं कर पाई है।

दिल्ली के चुनावों में बीजेपी का वोट शेयर

ऐसा नहीं है कि 1993 के बाद दिल्ली में बीजेपी ने कोई बहुत ही खराब प्रदर्शन किया है। मसला उन क्षेत्रों का है, जो पहले कभी कांग्रेस का किला थीं, वो अब आम आदमी पार्टी के पास चली गई। खासतौर से आरक्षित सीटें। अगर अब तक के चुनावों का वोट प्रतिशत देखेंगे तो समझ में आएगा कि बीजेपी का वोट शेयर कभी भी 30 फीसदी से कम नहीं हुआ है। यहां तक कि 2020 में जब उसके खाते में महज 8 सीटें आईं, तब भी वोट प्रतिशत 38 फीसदी से ज्यादा था। यह 1993 के बाद सबसे ज्यादा है।
साल BJP वोट प्रत‍िशत सीटें जीती
1993 42.82 % 49
1998 34.02 % 15
2003 35.22 % 20
2008 36.34 % 23
2013 33.07 % 31
2015 32.19 % 03
2020 38.51 % 08

इन सीटों पर आज तक नहीं जीती BJP

दिल्ली में कुछ ऐसी सीटें हैं, जहां पर बीजेपी आज तक जीत दर्ज नहीं कर पाई है। अगर इस बार बीजेपी को सत्ता में आना है तो उन्हें इन सीटों पर भी कमाल करना होगा। सुल्तानपुर माजरा सीट पर 1993 में सरकार बनाने के बावजूद बीजेपी तीसरे नंबर पर रही। पहले यह सीट कांग्रेस का गढ़ थी, लेकिन बाद में आम आदमी पार्टी (AAP) ने इस पर कब्जा जमा लिया। इसी तरह मंगोलपुरी सीट है, जहां 1993 में बीजेपी को 7000 से ज्यादा वोटों से हार मिली थी। हालांकि इस बार बीजेपी ने कांग्रेस के ही पूर्व विधायक राजकुमार चौहान पर दांव लगाया है। विष्णु गार्डन, सीलमपुर, मटिया महल और बल्लीमारान पर भी आज तक बीजेपी नहीं जीत पाई है।

1993 में जीती फिर लंबा इंतजार

यही नहीं ऐसी भी कई सीटें हैं, जिसमें 1993 में बीजेपी ने जीत दर्ज की। मगर तब से यहां वह जीत से दूर ही रही है। पटपड़गंज में 1993 में बीजेपी के ज्ञान चंद ने जीत दर्ज की, लेकिन फिर यह सीट कांग्रेस के पास चली गई। 2013 से मनीष सिसोदिया यहां से लगातार जीतते आए हैं। इस बार आम आदमी पार्टी ने अवध ओझा को यहां से टिकट दी है। इसी तरह शाहदरा, आदर्श नगर, चांदनी चौक, तिमार पुर, पटेल नगर सीटों पर भी 1993 के बाद से जीत का इंतजार है। दिल्ली की मुख्यमंत्री आतिशी जिस कालकाजी सीट से चुनाव मैदान में है, उस पर भी बीजेपी को आखिरी बार 1993 में ही जीत मिली थी। नई दिल्ली सीट पर 1993 में कीर्ति आजाद ने बीजेपी को जिताया था। तब इस सीट का नाम गोल मार्केट था। इसके बाद यह सीट शीला दीक्षित और फिर अरविंद केजरीवाल के पास चली गई।


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