जीते जी मां-बाप का पिंडदान, 15 की उम्र में छोड़ा घर द्वार, हैरान करने वाली है बिहार के नागा बाबा की कहानी

सहरासा/प्रयागराज: संगम नगरी प्रयागराज में चल रहे महाकुंभ मेले में इन दिनों साधु-संतो का जुटान है। साधु-संतो में खासकर नागा साधु सबसे ज्यादा आकर्षण और लोगों के बीच चर्चा का विषय बने हैं। लोग नागा साधुओं की रहस्यमयी दुनिया के बारे में जानना समझना चाहते हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि नागा साधु केवल कुंभ मेले के दौरान ही क्यों दिखते हैं। बाकी दिनों में ये कहां रहते हैं। तमाम साधु-संतों के बीच बिहार के एक नागा साधु से मुलाकात हुई। आइए उनके बारे में जानते हैं।प्रयागराज महाकुंभ के दौरान मिले एक नागा बाबा सवा लाख रुद्राक्ष पहने हुए दिखे। इन्होंने अपना नाम महेंद्र वशिष्ठ गिरि उर्फ रुद्राक्ष वाले बाबा बताया। इनके गुरु का नाम थनापति घनानंद जी महाराज है। ये बाबा जूना अखाड़े से ताल्लुक रखते हैं। महेंद्र वशिष्ठ गिरि बाबा ने बताया कि वह 2010 में संन्यासी बने। तब उनकी उम्र महज 15 साल थी। पूछने पर उन्होंने बताया कि वह मूल रूप से बिहार के सहरसा जिले के रहने वाले हैं। जब उनसे उनके गांव का नाम पूछा गया तो उन्होंने बताने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि वह उनकी पिछली जिंदगी थी, जिसके बारे में वह बात नहीं करना चाहते हैं। मां-पिता के बारे में पूछने पर बाबा ने कहा कि उन्होंने उनका पिंड दान कर दिया है। इसलिए वह उनके बारे में कुछ भी बताना नहीं चाहते हैं। अब उनकी पहचान जूना अखाड़े के बाबा के रूप में है। नागा बाबा ने बताया कि रुद्राक्ष भगवान भोले शंकर का श्रृंगार होता है, इसलिए वह भी इसे धारण करते हैं। उन्होंने बताया कि नागा संन्यासी बनने के बाद उनके लिए घर-द्वार का कोई मतलब नहीं है। महेंद्र वशिष्ठ गिरि बाबा ने बताया कि उन्होंने पढ़ाई लिखाई नहीं की है। वह कभी भी स्कूल नहीं गए। उन्होंने सारी शिक्षा गुरुकुल में हासिल की है। जहां उन्हें अपने गुरु की सेवा करना अपने आश्रम का मान सम्मान बरकरार रखना सिखाया गया है। बता दें कि संगम नगरी प्रयागराज में 13 जनवरी से शुरू हुआ महाकुंभ 26 फरवरी तक चलेगा। 144 साल बाद महाकुंभ आया है, इसके चलते हर कोई स्नान के लिए संगम नगरी प्रयागराज पहुंच रहा है।


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