नीतीश का बिहार में नंबर वन बनने का प्लान रेडी, क्या इसी साल होंगे विधानसभा चुनाव?

पटना: लोकसभा चुनाव रिजल्ट आने के बाद बिहार में एक बार फिर इस चर्चा को पर लग गए हैं कि मुख्यमंत्री झारखंड के साथ ही बिहार विधान सभा का चुनाव चाहते हैं। वैसे भी नीतीश कुमार 'वन नेशन वन इलेक्शन' के हिमायती रहे हैं। इसी वजह को लेकर यह बात चर्चा में हमेशा रही है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बिहार में नंबर वन पार्टी से नंबर थ्री की पार्टी बनना काफी कचोटता है। 2020 के विधान सभा चुनाव में जेडीयू के 43 विधायकों की संख्या में सिमट जाना हमेशा राजनीतिक पराभव का अहसास करा जाता है। हालांकि यह नीतीश कुमार का हाल ही में आया विचार नहीं है, इसके पहले भी कई बार बिहार विधान सभा का चुनाव पहले करा लेने की टिप्पणी नीतीश कुमार करते रहे हैं।

पहली बार 2023 में चर्चा में आया चुनाव कराने का विचार

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पहली बार जून 2023 में विधान सभा चुनाव समय से पहले होने की बात की थी। मौका था आपदा विभाग की बैठक का, जिसमें नीतीश कुमार ने अपने संबोधन में पहली बार पदाधिकारियों को निर्देश देते हुए कहा कि जल्दी जल्दी काम समाप्त करें राज्य में चुनाव कभी भी हो सकता है। बिहार विधान सभा चुनाव करा लेने की चर्चा तब हुई जब नीतीश कुमार दूसरी बार महागठबंधन का साथ छोड़कर एनडीए की सरकार बना रहे थे। तब यह बात चर्चा में थी कि नीतीश कुमार चाहते थे कि लोकसभा के साथ विधान सभा का चुनाव हो जाए। लेकिन कहा जाता है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व ने यह कहकर प्रस्ताव ठुकराया कि वोटर कंफ्यूज कर जायेंगे। लोकसभा चुनाव के बाद कभी भी विधान सभा का चुनाव करा लेंगे। लोकसभा का जब परिणाम आया तो अपेक्षा से अधिक सीट मिलने पर नीतीश कुमार उत्साहित होकर एक बार फिर पीएम नरेंद्र मोदी से विधान सभा चुनाव समय से पहले कराने को लेकर चर्चा हुई। पर अधिकृत रूप से इस तरह के निर्णय की कोई अधिकृत जानकारी नहीं मिली।

छोटे भाई की भूमिका से मुक्त होना चाहते हैं नीतीश

एनडीए गठबंधन में नीतीश कुमार 2005 से ही हमेशा बड़े भाई की भूमिका निभाते आए। 2020 के विधान सभा चुनाव में मात्र 43 सीटों पर सिमट जाने के कारण बिहार में तीसरे नंबर की पार्टी बन उन्हें अच्छा नहीं लगा। और सबसे ज्यादा निराशा तो तब हुई जब इंडिया गठबंधन में रहते लोकसभा के सीटों का बंटवारा हो रहा था तो आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने विधायकों की संख्या के आधार पर 8 से 10 सीट देने को तैयार थे। तब इंडिया गठबंधन में 16 सीटिंग सांसदों के फॉर्मूला को ठुकरा दिया था। वजह बताई कि 2019 के लोकसभा में दो सीटिंग सांसद रहते हुए भी भाजपा से 16 लोकसभा सीट पर लड़ने का आधार विधायक की संख्या को बनाया था। अब इंडिया गठबंधन में नीतीश कुमार चले तो गए, लेकिन जिस मकसद के लिए गए वह पूरा होते नहीं दिखा और अंततः नीतीश कुमार को इंडिया गठबंधन से अलग होना पड़ा।

चाहते तो हैं नीतीश : ओमप्रकाश अश्क

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चाहते तो हैं। उनकी बात मीडिया में आई भी है। यह बात भी सच है कि तीसरे नंबर की पार्टी बन जाना उन्हें रह रह कर परेशान तो करता है। महागठबंधन की सरकार में रहते हुए जून माह में नीतीश कुमार ने पदाधिकारियों को शीघ्र काम करने का निर्देश देते यह संभावना व्यक्त भी की थी कि चुनाव कभी भी हो सकता है। लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद नीतीश कुमार काफी उत्साहित हैं। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने तो कहा था कि जेडीयू को पांच सीटों से ज्यादा नहीं मिलने जा रही है। हमसे लिखवा लीजिए। लेकिन बिहार में 16 सीटों पर लड़कर जदयू के द्वारा 12 सीटें निकाल लेने से नीतीश कुमार उत्साहित तो जरूर हैं। इसलिए नीतीश कुमार चाहेंगे कि समय से पहले चुनाव हो जाए। वैसे भी झारखंड का चुनाव दिसंबर में संभावित है। इसके साथ महाराष्ट्र और हरियाणा विधान सभा का भी चुनाव होना है। पर भाजपा की प्रतिक्रिया क्या है यह अधिकृत रूप से सामने नहीं आई है।

आत्मघाती कदम होगा: प्रवीण बागी

समय से पहले और वह भी झारखंड के साथ बिहार विधान सभा का चुनाव कराना मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए आत्मघाती कदम होगा। ऐसा इसलिए कि नीतीश कुमार पहले वाले नीतीश नहीं रहे। लोकसभा चुनाव में 16 सीटिंग सांसद से 12 सीटों पर सिमट गए। फिल्हाल समय से पहले चुनाव कराने की अनुमति उनका स्वास्थ्य भी नहीं दे रहा है। अगर चुनाव कराना होता तो अभी ताबड़तोड़ जनसभा करते। विभागीय कार्यक्रम लगातार कराते। पर अभी तो सब कुछ अपने आवास से ही संचालित कर रहे हैं।इसके बावजूद वो समय से पहले चुनाव कराएंगे तो भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। अगर जदयू के अंदरखाने की बात करें तो उनके विधायक भी चुनाव नहीं चाहते हैं। वैसे सब कुछ नीतीश कुमार पर निर्भर है। पर इतना तो तय है कि समय से पहले चुनाव कराएंगे तो उन्हें विधान सभा में नुकसान उठाना होगा।


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