मघ-मघ पन द... बरश क बछर क लए तरस रह बहर-झरखड सखड़ क आशक स कसन हलकन

पटना/रांचीः अब यह साफ हो गया है कि लोगों को इस साल सुखाड़ का सामना करना पड़ेगा। जून खत्म हो गया, पर बिहार के 37 जिले अब भी सूखे हैं। झारखंड में कमोबेश यही हाल है। ज्यादातर जिलों में तालाब सूख गए हैं। ट्बवेल सूख गए हैं। कहने को मानसून ने दस्तक दे दी है, लेकिन बिहार-झारखंड की धरती की प्यास नहीं बुझ पा रही। बिहार में सामान्य से 80 से 90 प्रतिशत कम बारिश हुई है। जबकि झारखंड में भी 1 से लेकर 26 जून तक सामान्य रूप से 64 प्रतिशत से कम बारिश हुई है। बिहार और झारखंड की सरकारें जल्दी ही सुखाड़ का आकलन शुरू करेंगी। मानसून के रूठने का सर्वाधिक असर किसानों पर पड़ता है। खरीफ की खेती पर इसका बुरा असर पड़ेगा। सबसे दुखद यह है कि छिटफुट कहीं बारिश हो भी रही है तो फायदा से अधिक जान-माल का नुकसान हो रहा है। ठनका गिरने से हर सैकड़ों मौतें हर साल बिहार-झारखंड में होती हैं। बिहार में अब तक सौ से अधिक लोगों की मौत ठनका की चपेट में आने से हो चुकी है। झारखंड तो ठनका से सर्वाधिक प्रभावित होने वाले इलाकों में शुमार है। पिछले ही साल झारखंड के बोकारो में एक स्कूल पर ठनका गिरा तो 50-55 बच्चे झुलस गए थे। उसके पहले भी झारखंड में ऐसी घटनाएं होती रही हैं।

झारखंड में हर साल ठनका से औसतन 300 मौतें

ठनका गिरने के मामले में झारखंड संवेदनशील सूबा माना जाता है। हर साल तकरीबन 350 लोगों की जान ठनका लेता रहा है। पहले भीषण गर्मी से मौतें और अब मानसून आते ही ठनका से मृत्यु। इसके बावजूद मौत का गम लोग सह भी लेते, अगर भरपूर खेती लायक बारिश होती। अब से करीब 15 साल पहले झारखंड के एक स्कूल पर बिजली (ठनका) गिरी। करीब आधा दर्जन बच्चों की जान चली गई थी। उसके बाद सभी स्कूलों के भवनों पर तड़ित चालक लगाए गए थे। पिछले साल बोकारो के एक स्कूल पर बिजली गिरी तो सच्चाई सामने आई। झारखंड के 11 हजार से अधिक स्कूलों से तड़ित चालक गायब हैं। आश्चर्य यह कि तड़ित चालक चोरी होने की प्राथमिकी भी अधिकतर स्कूलों ने दर्ज नहीं कराई है।

झारखंड के 11544 स्कूलों में नहीं हैं तड़ित चालक

झारखंड के एक स्कूल पर ठनका गिरने की पहली घटना 2009 में हुई थी। तब सरकार ने सभी स्कूलों में तड़ित चालक लगवाए थे। उसके बाद किसी ने सुध नहीं ली कि ये तड़ित चालक खराब हो गए हैं या गायब हो गए हैं। राज्य के 18 जिलों के 11544 स्कूलों में तड़ित चालक गायब हैं। ये या तो चोरी हो गए या फिर खराब हो गए। जिन स्कूलों से तड़ित चालक की चोरी हुई, वहां के कुछ शिक्षकों ने प्राथमिकी दर्ज कराई तो अधिकतर लापरवाह रहे। जानकारी के मुताबिक रांची से 11558, लातेहार से 100, हजारीबाग से 1324, रामगढ़ से 560, पलामू से 1700 और गुमला से 342 स्कूलों में तड़ित चालकों की चोरी हो चुकी है। जबकि सिमडेगा से 135, गढ़वा से 107, लोहरदगा से 162, गोड्डा से 450, जामताड़ा से 850, पाकुड़ से 400, जमशेदपुर से 910, देवघर से 508, धनबाद से 368, बोकारो से 680, साहिबगंज से 590 और चतरा से 1200 तड़ित चालकों की चोरी हो चुकी है।

हाईकोर्ट के आदेश पर लगाए गए थे तड़ित चालक

झारखंड हाईकोर्ट ने तकरीबन डेढ़ दशक पहले 2009 में सभी स्कूलों में 6 महीने के अंदर तड़ित चालक लगाने का आदेश दिया था। शिक्षा परियोजना की ओर से ग्राम शिक्षा समिति को प्रति तड़ित चालक 34 हजार रुपये खर्च किए गए थे। हालांकि इसके बावजूद सभी स्कूलों में तड़ित चालक नहीं लगाए जा सके थे। आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार झारखंड में बिजली (ठनका) गिरने से पिछले सात साल में 1549 लोगों की मौत हो चुकी है। इस साल मई तक 27 लोगों की जान ठनका ने ले ली है। साल 2017 में ठनका से 256 मौतें झारखंड में हुई थीं। साल 2018 में 261, साल 2019 में 283, साल 2020 में 322, साल 2021 में 343 और 2022 में 57 लोगों की मौत ठनका से हुई थी।

बिहार में भी बिजली गिरने से होती हैं सैकड़ों मौतें

बिहार में भी हर साल औसतन 300 लोगों की जान आकाशीय बिजली (ठनका) गिरने से चली जाती है। कई बार तो आंकड़ा औसत को भी पार कर जाता है। बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार आकाशीय बिजली से बचने के उपायों की जानकारी लोगों तक पहुंच तो रही है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में साधारण लोगों तक समय पर जानकारी नहीं पहुंच पाती। नतीजतन शहरों की अपेक्षा बिहार की ग्रामीण आबादी इसकी सर्वाधिक शिकार होती है। अधिकतर शहरी मकानों में तो आकाशीय बिजली से बचाने वाले यंत्र तड़ित रोधी उपकरण (लाइटनिंग अरेस्टर) और तड़ित चालक (लाइटनिंग कंडक्टर) लगे रहते हैं, लेकिन गांवों में इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता। गांवों में खुले खेतों में पड़े लोहे-तांबे के सामान, जलस्रोत, ऊंचे पेड़ आकाशीय बिजली को अपनी ओर खींचते हैं। इससे आसपास रहे लोग ठनका की चपेट में आ जाते हैं।

क्लाईमेट चेंज का असर, कहीं बाढ़ तो कहीं सुखाड़

दरअसल क्लाईमेट चेंज से पूरी दुनिया तबाह है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और कंक्रीट के बढ़ते जंगल क्लाईमेट चेंज के प्रमुख कारण हैं। कभी झारखंड में 30-35 डिग्री सेल्सियस तापमान पहुंचते ही बारिश हो जाती थी। अब तो 40-47 डिग्री तापमान पर भी बारिश का कहीं अता-पता नहीं रहता। क्लाईमेट चेंज का ही नतीजा है कि राजस्थान के रेगिस्तान में बाढ़ आ गई है तो बाढ़ की हर साल विभीषिका झेलने वाला बिहार सुखाड़ की चपेट में दिख रहा है।रिपोर्ट- ओमप्रकाश अश्क


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